dard bhari ghazal Best evers sad ghazals

dard bhari ghazal Best evers sad ghazals

अगर हिल आफ हैं होने दो जान थोड़ी है। यह सब दुआ है। कोई आसमान थोड़ी है लगेगी। आग तो आएंगे घर कई ज़द में यहां पर सिर्फ हमारा मकान थोड़ी है। मैं जानता हूं कि दुश्मन भी कम नहीं। लेकिन हमारी तरह हथेली पर जान थोड़ी है। हमारे मुंह से जो निकले वही सदाकत है। हमारे मुंह में तुम्हारी जुबान थोड़ी है। जो आज साहब बंद है, कल नहीं होंगे। किराएदार हैं। जाति मकान थोड़ी है सभी का खून है शामिल यहां की मिट्टी में। किसी के बाप का हिंदुस्तान थोड़ी है।

Sad ghazals best ghazals in hindi urdu ghazal

खूब-खूब फैल गई बात छे ना सहाई कि उसने खुशबू की तरह मेरी प्रजा राय की कैसे कह दूं कि मुझे छोड़ दिया है। उसने बात तो सच है। मगर बात है रुसवाई कि वह कहीं भी गया तो लौटा तो मेरे पास आया बस यही बात है। अच्छी मेरे हरजाई कि तेरे पहलू तेरे दिल की तरह आबाद रहे तुझ पर गुजरे ना कयामत शब्द तन्हाई कि उसने जलती हुई पेशानी पर जब हाथ रखा रोहतक आ गई तस्वीर में साईं की अभी बरसात की रातों में बदन टूटता है जाग उठती है अजब ख्वाहिशें अंगड़ाईकी।

sang e mar mar se tarasha hua ye shokh badan in hindi urdu

سنگ مرمر سے تراشا ہوا تیرا یہ شفاف بدن اتنا دلکش ہے کہ اپنانے کو جی چاہتا ہے سرخ ہونٹوں پہ تھرکتی وہ رنگین شراب جس کو پی کے بہک جانے کو جی چاہتا ہے تم سے کیا رشتہ ہے کب سے ہے یہ معلوم نہیں مگر اس حسن پہ مر جانے کو جی

Best ghazals

ہم سے تو اچھی ہے یہ پا زیب جو اس پاؤں میں ہے اسی پازیب میں ڈل جانے کو جی چاہتا ہے رکھ لو یہ دوسری پازیب کل کے لیے قیس کل پھر اسی بزم میں آنے کو جی چاہتا ہے

best evers ghazals

संगमरमर से तराशा हुआ तेरा यह शफाफ बदन इतना दिलकश है कि अपनाने को जी चाहता है सुर्ख होठों पर थिरक थी वो रंगीन शराब जिसको पीकर बहक जाने को जी चाहता है तुमसे क्या रिश्ता है और कब से है यह मालूम नहीं मगर इस हुस्न पर मर जाने को जी चाहता है। हमसे तो अच्छी है यह पाजेब जो इस गांव में है इसी पास जेब में ढल जाने को जी चाहता है रख लो यह दूसरी पाजेब कल के लिए गैस कल फिर इसी वजन में आने को जी चाहता है।

dard bhari ghazal

aah ko chaahiye ik umr asar hone tak
kaun jeeta hai teri zulf ke sar hone tak ?

mmirza ghalib

گھر جب بنا لیا ترے در پر کہے بغیر
جانے گا اب بھی تو نہ مرا گھر کہے بغیر

کہتے ہیں جب رہی نہ مجھے طاقت سخن
جانوں کسی کے دل کی میں کیونکر کہے بغیر

کام اس سے آ پڑا ہے کہ جس کا جہان میں
لیوے نہ کوئی نام ستم گر کہے بغیر

جی میں ہی کچھ نہیں ہے ہمارے وگرنہ ہم
سر جائے یا رہے نہ رہیں پر کہے بغیر

چھوڑوں گا میں نہ اس بت کافر کا پوجنا
چھوڑے نہ خلق گو مجھے کافر کہے بغیر

مقصد ہے ناز و غمزہ ولے گفتگو میں کام
چلتا نہیں ہے دشنہ و خنجر کہے بغیر

ہر چند ہو مشاہدۂ حق کی گفتگو
بنتی نہیں ہے بادہ و ساغر کہے بغیر

بہرا ہوں میں تو چاہیئے دونا ہو التفات
سنتا نہیں ہوں بات مکرر کہے بغیر

غالب نہ کر حضور میں تو بار بار عرض
ظاہر ہے تیرا حال سب ان پر کہے بغیر
مرزا غالب

aashiqee sabr talab aur tamanna betaab
dil ka kya rang karooN KHoon-e-jigar hone tak ?

humne maana ke taGHaful na karoge lekin,
KHaak ho jaayeNge ham tumko KHabar hone tak

GHam-e-hastee ka ‘Asad’ kis se ho juz marg ilaaz
shamma har rang meiN jaltee hai sahar hone tak


hazaaroN KHwahishaiN aisi ke har KHwahish pe dum nikale
Mirza ghalib ghazals

hazaaroN KHwahishaiN aisi ke har KHwahish pe dum nikale
bohot nikle mere armaaN lekin fir bhee kum nikale

nikalna KHuld se aadam ka sunte aayaiN haiN lekin
bohot beaabaru hokar tere kooche se hum nikale

mohabbat meiN naheeN hai farq jeene aur marne kaa
usee ko dekh kar jeete haiN jis kaafir pe dum nikale

KHuda ke waaste parda nakaabe se uThaa zaalim
kaheeN aisa na ho yaaN bhee wohee kaafir sanam nikale

kahaaN maiKHaane ka darwaaza ‘GHalib’ aur kahaaN waaiz
par itana jaante haiN kal wo jaata tha ke hum nikale

dard bhari ghazal
dard bhari ghazal

اگر خلاف ہیں ہونے دو جان تھوڑی ہے
یہ سب دھواں ہے کوئی آسمان تھوڑی ہے
لگے گی آگ تو آئیں گے گھر کئی زد میں
یہاں پہ صرف ہمارا مکان تھوڑی ہے
میں جانتا ہوں کہ دشمن بھی کم نہیں لیکن
ہماری طرح ہتھیلی پہ جان تھوڑی ہے
ہمارے منہ سے جو نکلے وہی صداقت ہے
ہمارے منہ میں تمہاری زبان تھوڑی ہے
جو آج صاحب مسند ہیں کل نہیں ہوں گے
کرائے دار ہیں ذاتی مکان تھوڑی ہے
سبھی کا خون ہے شامل یہاں کی مٹی میں
کسی کے باپ کا ہندوستان تھوڑی ہے​
راحت اندوری

dard bhari ghazal

dard bhari ghazal

dard bhari ghazal

Rahat indori shayari photo shayari image Rahat indori

गुलाब ख़्वाब दवा ज़हर जाम क्या-क्या है
मैं आ गया हूँ बता इन्तज़ाम क्या-क्या है

फक़ीर शेख कलन्दर इमाम क्या-क्या है
तुझे पता नहीं तेरा गुलाम क्या क्या है

अमीर-ए-शहर के कुछ कारोबार याद आए
मैँ रात सोच रहा था हराम क्या-क्या है

dard bhari ghazal

dard bhari ghazal

Rahat indori shayari photo shayari image Rahat indori

बुलाती है मगर जाने का नहीं
ये दुनिया है इधर जाने का नहीं

मेरे बेटे किसी से इश्क़ कर
मगर हद से गुज़र जाने का नहीं

ज़मीं भी सर पे रखनी हो तो रखो
चले हो तो ठहर जाने का नहीं

सितारे नोच कर ले जाऊंगा
मैं खाली हाथ घर जाने का नहीं

वबा फैली हुई है हर तरफ
अभी माहौल मर जाने का नहीं

वो गर्दन नापता है नाप ले
मगर जालिम से डर जाने का नहीं

dard bhari ghazal

dard bhari ghazal

तेरी हर बात मोहब्बत में गवारा करके
दिल के बाज़ार में बैठे हैँ ख़सारा करके

आसमानो की तरफ फेक दिया है मैंने
चंद मिट्टी के चिरागों को सितारा करके

एक चिन्गारी नज़र आई थी बस्ती मेँ उसे
वो अलग हट गया आँधी को इशारा करके

मैं वो दरिया हूँ कि हर बूँद भंवर है जिसकी
तुमने अच्छा ही किया मुझसे किनारा करके

आते जाते है कई रंग मेरे चेहरे पर
लोग लेते है मज़ा जिक्र तुम्हारा करके

मुन्तज़िर हूँ कि सितारों की ज़रा आँख लगे
चाँद को छत पे बुला लूँगा इशारा करके

dard bhari ghazal

सिर्फ खंजर ही नहीं आँखों में पानी चाहिए,
ऐ खुदा दुश्मन भी मुझको खानदानी चाहिए

मैंने अपनी खुश्क आँखों से लहू छलका दिआ,
एक समन्दर कह रहा था मुझको पानी चाहिए।

सिर्फ खबरों की ज़मीने देके मत बहलाइये
राजधानी दी थी हमने, राजधानी चाहिए

dard bhari ghazal

dard bhari ghazal

हम अपनी जान के दुश्मन को अपनी जान कहते हैं
मोहब्बत की इसी मिट्टी को हिन्दुस्तान कहते हैं

ज दुनिया में सुनाई दे उसे कहते है ख़ामोशी
जो आँखों में दिखाई दे उसे तूफान कहते है

जो ये दीवार का सुराख है साज़िश का हिस्सा है
मगर हम इसको अपने घर का रोशनदान कहते हैं

ये ख्वाहिश दो निवालों की हमें बर्तन की हाजत क्या
फ़क़ीर अपनी हथेली को ही दस्तरख्वान कहते हैं

मेरे अंदर से एक-एक करके सब कुछ हो गया रुखसत
मगर एक चीज़ बाकी है जिसे ईमान कहते हैं

dard bhari ghazal

अगर खिलाफ है होने दो जान थोड़ी है,
ये सब धुँआ है कोई आसमान थोड़ी है |

लगेगी आग तो आएंगे घर कई ज़द में,
यहाँ पे सिर्फ हमारा मकान थोड़ी है |

हमारे मुह से जो निकले वही सदाकत है,
हमरे मुह में तुम्हारी जबान थोड़ी है |

मै जानता हूँ कि दुश्मन भी कम नहीं है,
लेकिन हमारी तरह हथेली पे जान थोड़ी है |

आज शाहिबे मसनद है कल नहीं होंगे,
किरायेदार है जात्ती मकान थोड़ी है |

सभी का खून है शामिल इस मिट्टी में,
किसे के बाप का हिन्दुस्तान थोड़ी है |

dard bhari ghazal

dard bhari ghazal

तेरी हर बात मोहब्बत में गवारा करके
दिल के बाज़ार में बैठे हैँ ख़सारा करके

आसमानो की तरफ फेक दिया है मैंने
चंद मिट्टी के चिरागों को सितारा करके

एक चिन्गारी नज़र आई थी बस्ती मेँ उसे
वो अलग हट गया आँधी को इशारा करके

मैं वो दरिया हूँ कि हर बूँद भंवर है जिसकी
तुमने अच्छा ही किया मुझसे किनारा करके

आते जाते है कई रंग मेरे चेहरे पर
लोग लेते है मज़ा जिक्र तुम्हारा करके

मुन्तज़िर हूँ कि सितारों की ज़रा आँख लगे
चाँद को छत पे बुला लूँगा इशारा करके

dard bhari ghazal

अगर हिल आफ हैं होने दो जान थोड़ी है। यह सब दुआ है। कोई आसमान थोड़ी है लगेगी। आग तो आएंगे घर कई ज़द में यहां पर सिर्फ हमारा मकान थोड़ी है। मैं जानता हूं कि दुश्मन भी कम नहीं। लेकिन हमारी तरह हथेली पर जान थोड़ी है। हमारे मुंह से जो निकले वही सदाकत है। हमारे मुंह में तुम्हारी जुबान थोड़ी है। जो आज साहब बंद है, कल नहीं होंगे। किराएदार हैं। जाति मकान थोड़ी है सभी का खून है शामिल यहां की मिट्टी में। किसी के बाप का हिंदुस्तान थोड़ी है।

اگر خلاف ہیں ہونے دو جان تھوڑی ہے
یہ سب دھواں ہے کوئی آسمان تھوڑی ہے

لگے گی آگ تو آئیں گے گھر کئی زد میں
یہاں پہ صرف ہمارا مکان تھوڑی ہے

میں جانتا ہوں کہ دشمن بھی کم نہیں لیکن
ہماری طرح ہتھیلی پہ جان تھوڑی ہے

ہمارے منہ سے جو نکلے وہی صداقت ہے
ہمارے منہ میں تمہاری زبان تھوڑی ہے

جو آج صاحب مسند ہیں کل نہیں ہوں گے
کرائے دار ہیں ذاتی مکان تھوڑی ہے

سبھی کا خون ہے شامل یہاں کی مٹی میں
کسی کے باپ کا ہندوستان تھوڑی ہے​

راحت اندوری

dard bhari ghazal
dard bhari ghazal

मैं आखिर कौन सा मौसम तुम्हारे नाम कर देता। यहां हर एक मौसम को गुजर जाने की जल्दी थी राहत इंदौरी!

میں آخر کون سا موسم تمہارے نام کر دیتا
یہاں ہر ایک موسم کو گزر جانے کی جلدی تھی

راحت اندوری

dard bhari ghazal

rahat indori best shayari photo hindi urdu ghazals

पता नहीं यह परिंदे कहां से आ पहुंचे अभी जमाना कहां था उदास होने का राहत इंदौरी।

پتہ نہیں یہ پرندے کہاں سے آ پہنچے
ابھی زمانہ کہاں تھا اداس ہونے کا

راحت اندوری

dard bhari ghazal

हम से पहले भी मुसाफिर कहीं गुजरे होंगे कम से कम राह के पत्थर तो हट आते जाते राहत इंदौरी।

ہم سے پہلے بھی مسافر کئی گزرے ہوں گے
کم سے کم راہ کے پتھر تو ہٹاتے جاتے

راحت اندوری

راحت اندوری rahat indori

زندگی بھر دور رہنے کی سزائیں رہ گئیں
میرے کیسہ میں مری وفائیں رہ گئیں

نوجواں بیٹوں کو شہروں کے تماشے لے اڑے
گاؤں کی جھولی میں کچھ مجبور مائیں رہ گئیں

بجھ گیا وحشی کبوتر کی ہوس کا گرم خون
نرم بستر پر تڑپتی فاختائیں رہ گئیں

ایک اک کر کے ہوئے رخصت مرے کنبے کے لوگ
گھر کے سناٹے سے ٹکراتی ہوائیں رہ گئیں

بادہ خانے شاعری نغمے لطیفے رتجگے
اپنے حصے میں یہی دیسی دوائیں رہ گئیں

dard bhari ghazal

راحت اندوری
میں لاکھ کہہ دوں کہ آکاش ہوں زمیں ہوں میں
مگر اسے تو خبر ہے کہ کچھ نہیں ہوں میں

عجیب لوگ ہیں میری تلاش میں مجھ کو
وہاں پہ ڈھونڈ رہے ہیں جہاں نہیں ہوں میں

میں آئنوں سے تو مایوس لوٹ آیا تھا
مگر کسی نے بتایا بہت حسیں ہوں میں

وہ ذرے ذرے میں موجود ہے مگر میں بھی
کہیں کہیں ہوں کہاں ہوں کہیں نہیں ہوں میں

وہ اک کتاب جو منسوب تیرے نام سے ہے
اسی کتاب کے اندر کہیں کہیں ہوں میں

ستارو آؤ مری راہ میں بکھر جاؤ
یہ میرا حکم ہے حالانکہ کچھ نہیں ہوں میں

یہ بوڑھی قبریں تمہیں کچھ نہیں بتائیں گی
مجھے تلاش کرو دوستو یہیں ہوں میں

dard bhari ghazal

dard bhari ghazal

rahat indori best shayari photo hindi urdu ghazals

rahat indori best shayari

https://shayari-urdu-hindi.com/shayari-level-shayari-urdu-hindi-english-aansu-shayari/

راحت اندوری
یہ خاک زادے جو رہتے ہیں بے زبان پڑے
اشارہ کر دیں تو سورج زمیں پہ آن پڑے

سکوت زیست کو آمادۂ بغاوت کر
لہو اچھال کہ کچھ زندگی میں جان پڑے

ہمارے شہر کی بینائیوں پہ روتے ہیں
تمام شہر کے منظر لہو لہان پڑے

اٹھے ہیں ہاتھ مرے حرمت زمیں کے لیے
مزا جب آئے کہ اب پاؤں آسمان پڑے

کسی مکین کی آمد کے انتظار میں ہیں
مرے محلے میں خالی کئی مکان پڑے

dard bhari ghazal

https://cacke-recipe.com/creme-egg-cupcakes-recipe-the-best-easy-cake-recipe

rahat indori best shayari photo hindi urdu ghazals

راحت اندوری
میرے کاروبار میں سب نے بڑی امداد کی
داد لوگوں کی گلا اپنا غزل استاد کی

اپنی سانسیں بیچ کر میں نے جسے آباد کی
وہ گلی جنت تو اب بھی ہے مگر شداد کی

عمر بھر چلتے رہے آنکھوں پہ پٹی باندھ کر
زندگی کو ڈھونڈنے میں زندگی برباد کی

داستانوں کے سبھی کردار کم ہونے لگے
آج کاغذ چنتی پھرتی ہے پری بغداد کی

اک سلگتا چیختا ماحول ہے اور کچھ نہیں
بات کرتے ہو یگانہ کس امین آباد کی

dard bhari ghazal

rahat indori best shayari photo hindi urdu ghazals

راحت اندوری
ساتھ منزل تھی مگر خوف و خطر ایسا تھا
عمر بھر چلتے رہے لوگ سفر ایسا تھا

جب وہ آئے تو میں خوش بھی ہوا شرمندہ بھی
میری تقدیر تھی ایسی مرا گھر ایسا تھا

حفظ تھیں مجھ کو بھی چہروں کی کتابیں کیا کیا
دل شکستہ تھا مگر تیز نظر ایسا تھا

آگ اوڑھے تھا مگر بانٹ رہا تھا سایہ
دھوپ کے شہر میں اک تنہا شجر ایسا تھا

لوگ خود اپنے چراغوں کو بجھا کر سوئے
شہر میں تیز ہواؤں کا اثر ایسا تھا

dard bhari ghazal

dard bhari ghazal

dard bhari ghazal

آ کہ مری جان کو قرار نہیں ہے

Poet: مرزا غالب

آ کہ مری جان کو قرار نہیں ہے
طاقت بیداد انتظار نہیں ہے

دیتے ہیں جنت حیات دہر کے بدلے
نشہ بہ اندازۂ خمار نہیں ہے

گریہ نکالے ہے تیری بزم سے مجھ کو
ہائے کہ رونے پہ اختیار نہیں ہے

ہم سے عبث ہے گمان رنجش خاطر
خاک میں عشاق کی غبار نہیں ہے

دل سے اٹھا لطف جلوہ ہائے معانی
غیر گل آئینۂ بہار نہیں ہے

قتل کا میرے کیا ہے عہد تو بارے
وائے اگر عہد استوار نہیں ہے

تو نے قسم مے کشی کی کھائی ہے غالبؔ
تیری قسم کا کچھ اعتبار نہیں ہےmirza ghalib

ہزاروں خواہشیں ایسی کہ ہر خواہش پہ دم نکلے

Poet: Mirza Ghalib

ہزاروں خواہشیں ایسی کہ ہر خواہش پہ دم نکلے
بہت نکلے مرے ارمان لیکن پھر بھی کم نکلے

ڈرے کیوں میرا قاتل کیا رہے گا اس کی گردن پر
وہ خوں جو چشم تر سے عمر بھر یوں دم بدم نکلے

نکلنا خلد سے آدم کا سنتے آئے ہیں لیکن
بہت بے آبرو ہو کر ترے کوچے سے ہم نکلے

بھرم کھل جائے ظالم تیرے قامت کی درازی کا
اگر اس طرۂ پر پیچ و خم کا پیچ و خم نکلے

مگر لکھوائے کوئی اس کو خط تو ہم سے لکھوائے
ہوئی صبح اور گھر سے کان پر رکھ کر قلم نکلے

ہوئی اس دور میں منسوب مجھ سے بادہ آشامی
پھر آیا وہ زمانہ جو جہاں میں جام جم نکلے

ہوئی جن سے توقع خستگی کی داد پانے کی
وہ ہم سے بھی زیادہ خستۂ تیغ ستم نکلے

محبت میں نہیں ہے فرق جینے اور مرنے کا
اسی کو دیکھ کر جیتے ہیں جس کافر پہ دم نکلے

کہاں مے خانہ کا دروازہ غالبؔ اور کہاں واعظ
پر اتنا جانتے ہیں کل وہ جاتا تھا کہ ہم نکلے

دل ناداں تجھے ہوا کیا ہے

Poet: Mirza Ghalib

دل ناداں تجھے ہوا کیا ہے
آخر اس درد کی دوا کیا ہے

ہم ہیں مشتاق اور وہ بیزار
یا الٰہی یہ ماجرا کیا ہے

میں بھی منہ میں زبان رکھتا ہوں
کاش پوچھو کہ مدعا کیا ہے

جب کہ تجھ بن نہیں کوئی موجود
پھر یہ ہنگامہ اے خدا کیا ہے

یہ پری چہرہ لوگ کیسے ہیں
غمزہ و عشوہ و ادا کیا ہے

شکن زلف عنبریں کیوں ہے
نگہ چشم سرمہ سا کیا ہے

سبزہ و گل کہاں سے آئے ہیں
ابر کیا چیز ہے ہوا کیا ہے

ہم کو ان سے وفا کی ہے امید
جو نہیں جانتے وفا کیا ہے

ہاں بھلا کر ترا بھلا ہوگا
اور درویش کی صدا کیا ہے

جان تم پر نثار کرتا ہوں
میں نہیں جانتا دعا کیا ہے

میں نے مانا کہ کچھ نہیں غالبؔ
مفت ہاتھ آئے تو برا کیا ہے

آہ کو چاہیے اک عمر اثر ہوتے تک

Poet: Deewan-e-Ghalib

آہ کو چاہیے اک عمر اثر ہوتے تک
کون جیتا ہے تری زلف کے سر ہوتے تک

دام ہر موج میں ہے حلقۂ صد کام نہنگ
دیکھیں کیا گزرے ہے قطرے پہ گہر ہوتے تک

عاشقی صبر طلب اور تمنا بیتاب
دل کا کیا رنگ کروں خون جگر ہوتے تک

تا قیامت شب فرقت میں گزر جائے گی عمر
سات دن ہم پہ بھی بھاری ہیں سحر ہوتے تک

ہم نے مانا کہ تغافل نہ کرو گے لیکن
خاک ہو جائیں گے ہم تم کو خبر ہوتے تک

پرتو خور سے ہے شبنم کو فنا کی تعلیم
میں بھی ہوں ایک عنایت کی نظر ہوتے تک

یک نظر بیش نہیں فرصت ہستی غافل
گرمیٔ بزم ہے اک رقص شرر ہوتے تک

غم ہستی کا اسدؔ کس سے ہو جز مرگ علاج
شمع ہر رنگ میں جلتی ہے سحر ہوتے تک

آئینہ دیکھ اپنا سا منہ لے کے رہ گئے

Poet: Deewan-e-Ghalib

آئینہ دیکھ اپنا سا منہ لے کے رہ گئے
صاحب کو دل نہ دینے پہ کتنا غرور تھا

قاصد کو اپنے ہاتھ سے گردن نہ ماریے
اس کی خطا نہیں ہے یہ میرا قصور تھا

ضعف جنوں کو وقت تپش در بھی دور تھا
اک گھر میں مختصر بیاباں ضرور تھا

اے وائے غفلت نگۂ شوق ورنہ یاں
ہر پارہ سنگ لخت دل کوہ طور تھا

درس تپش ہے برق کو اب جس کے نام سے
وہ دل ہے یہ کہ جس کا تخلص صبور تھا

ہر رنگ میں جلا اسدؔ فتنہ انتظار
پروانۂ تجلی شمع ظہور تھا

شاید کہ مر گیا ترے رخسار دیکھ کر
پیمانہ رات ماہ کا لبریز نور تھا

جنت ہے تیری تیغ کے کشتوں کی منتظر
جوہر سواد جلوۂ مژگان حور تھا

. हर एक बात पे कहते हो तुम कि ‘तू क्या है’
हर एक बात पे कहते हो तुम कि ‘तू क्या है’
तुम्हीं कहो कि ये अंदाज़-ए-गुफ़्तगू क्या है

न शो’ले में ये करिश्मा न बर्क़ में ये अदा
कोई बताओ कि वो शोखे-तुंद-ख़ू क्या है

ये रश्क है कि वो होता है हमसुख़न तुमसे
वर्ना ख़ौफ़-ए-बद-आमोज़िए-अ़दू क्या है

चिपक रहा है बदन पर लहू से पैराहन
हमारी जैब को अब हाजत-ए-रफ़ू क्या है

जला है जिस्म जहाँ, दिल भी जल गया होगा
कुरेदते हो जो अब राख, जुस्तजू क्या है

रगों में दौड़ने-फिरने के हम नहीं क़ायल
जब आँख ही से न टपका, तो फिर लहू क्या है

वो चीज़ जिसके लिये हमको हो बहिश्त अज़ीज़
सिवाए वादा-ए-गुल्फ़ाम-ए-मुश्कबू क्या है

पियूँ शराब अगर ख़ुम भी देख लूँ दो-चार
ये शीशा-ओ-क़दह-ओ-कूज़ा-ओ-सुबू क्या है

रही न ताक़त-ए-गुफ़्तार और अगर हो भी
तो किस उमीद पे कहिए कि आरज़ू क्या है

हुआ है शाह का मुसाहिब, फिरे है इतराता
वगर्ना शहर में ‘ग़ालिब; की आबरू क्या है

शब्दार्थ:

शोखे-तुंद-ख़ू – बिज़ली
शोखे-तुंद-ख़ू – शरारती-अकड़ वाला
हमसुख़न – अकसर बातें करना
ख़ौफ़-ए-बद-आमोज़िए-अ़दू – दुश्मन के सिखाने-पढ़ाने का डर
पैराहन – चोला
हाजत-ए-रफ़ू – रफ़ू करने की जरूरत
जुस्तजू – तलाश
क़ायल – प्रभावित होना
बहिश्त – स्वर्ग
ऊपर अज़ीज़ – प्रिय
ऊपर वादा-ए-गुल्फ़ाम-ए-मुश्कबू – गुलाबी कस्तूरी-सुगंधित शराब
ख़ुम – शराब के ढ़ोल
शीशा-ओ-क़दह-ओ-कूज़ा-ओ-सुबू – बोतल, प्याला, मधु-पात्र और मधु-कलश
ताक़त-ए-गुफ़्तार – बोलने की ताकत
मुसाहिब – ऱाजा का दरबारी
आबरू – प्रतिष्ठा


aah ko chaahiye ik umr asar hone tak

aah ko chaahiye ik umr asar hone tak
kaun jeeta hai teri zulf ke sar hone tak ?

aashiqee sabr talab aur tamanna betaab
dil ka kya rang karooN KHoon-e-jigar hone tak ?

humne maana ke taGHaful na karoge lekin,
KHaak ho jaayeNge ham tumko KHabar hone tak

GHam-e-hastee ka ‘Asad’ kis se ho juz marg ilaaz
shamma har rang meiN jaltee hai sahar hone tak


har ek baat pe kehte ho tum

har ek baat pe kehte ho tum ke ‘too kya hai’ ?
tumheeN kaho ke yeh andaaz-e-guftgoo kya hai?

ragoN meiN dauDte firneke hum naheeN qaayal
jab aaNkh hee se na Tapka to fir lahoo kya hai ?

chipak raha hai badan par lahoo se pairaahan
hamaaree jeb ko ab haajat-e-rafoo kya hai ?

jalaa hai jism jahaaN dil bhee jal gaya hoga
kuredateho jo ab raakh, justjoo kya hai ?

rahee na taaqat-e-guftaar, aur agar ho bhee
to kis ummeed pe kahiye ke aarzoo kya hai ?

2. ग़ैर लें महफ़िल में बोसे जाम के
ग़ैर लें महफ़िल में बोसे जाम के

ग़ैर लें महफ़िल में बोसे जाम के
हम रहें यूँ तिश्ना-लब पैग़ाम के

ख़स्तगी का तुम से क्या शिकवा कि ये
हथकण्डे हैं चर्ख़-ए-नीली-फ़ाम के

ख़त लिखेंगे गरचे मतलब कुछ न हो
हम तो आशिक़ हैं तुम्हारे नाम के

रात पी ज़मज़म पे मय और सुब्ह-दम
धोए धब्बे जामा-ए-एहराम के

दिल को आँखों ने फँसाया क्या मगर
ये भी हल्क़े हैं तुम्हारे दाम के

शाह के है ग़ुस्ल-ए-सेह्हत की ख़बर
देखिए कब दिन फिरें हम्माम के

इश्क़ ने ग़ालिब निकम्मा कर दिया
वर्ना हम भी आदमी थे काम के

शब्दार्थ :

बोसे – चुम्मन
तिश्ना-लब – प्यासे होंठ
ख़स्तगी – कमजोरी
चर्ख़-ए-नीली-फ़ाम – नीला आकाश
जामा-ए-एहराम – एक ख़ास कपड़ा जो हज में पहनते हैं
हल्क़े – जंजीर
दाम – फासने के
ग़ुस्ल-ए-सेह्हत – तबियत ठीक होने के बाद का स्नान

Urdu ghazals hindi ghazals best sad status

آرزو کو روح میں غم بن کے رہنا آ گیا
سہتے سہتے ہم کو آخر رنج سہنا آ گیا

دل کا خوں آنکھوں میں کھنچ آیا چلو اچھا ہوا
میری آنکھوں کو مرا احوال کہنا آ گیا

سہل ہو جائے گی مشکل ضبط سوز و ساز کی
خون دل کو آنکھ سے جس روز بہنا آ گیا

میں کسی سے اپنے دل کی بات کہہ سکتا نہ تھا
اب سخن کی آڑ میں کیا کچھ نہ کہنا آ گیا

جب سے منہ کو لگ گئی اختر محبت کی شراب
بے پیے آٹھوں پہر مدہوش رہنا آ گیا

اختر انصاری

आरज़ू अपनी आत्मा में दुःख के साथ रहने के लिए आया था
जैसा कि हमने सहन किया, हमें आखिरकार भुगतना पड़ा

दिल का खून मेरी आँखों में उतर आया। चलो अच्छा हुआ
मेरी आँखें अलविदा कहने आईं

जलन को नियंत्रित करना आसान होगा
जिस दिन आंख से हृदय तक रक्त प्रवाहित हुआ

मैं अपने मन की बात किसी से नहीं कह सकता था
अब बोलने की आड़ में कुछ नहीं कहना है

जब से अख्तर ने प्यार की शराब पीना शुरू किया
मैं आठ बजे नशे में रहने आया था

अख्तर अंसारी

Urdu ghazals hindi ghazals best sad status

کیا خبر تھی اک بلائے ناگہانی آئے گی
نامرادی کی نشانی یہ جوانی آئے گی

سب کہیں گے کون کرتا ہے ہمارے راز فاش
جب مرے لب پر محبت کی کہانی آئے گی

نامرادی سے کہو منہ پھیر لے اپنا ذرا
میری دنیا میں عروس کامرانی آئے گی

جب خزاں کی نذر ہو جائے گی دنیا سے شباب
یاد اختر یہ ستم آرا جوانی آئے گی

اختر انصاری

क्या आप जानते हैं कि एक अप्रत्याशित कॉल आएगा?
निराशा का संकेत इस युवा आएगा

हर कोई कहेगा कि हमारे रहस्यों का खुलासा कौन करता है
जब प्रेम कहानी मरे के होठों पर आएगी

मुझे दूर करने के लिए व्यर्थ में बताओ
दुल्हन मेरी दुनिया में समृद्ध होगी

जब शरद ऋतु प्रतिज्ञाओं को दुनिया से दूर ले जाया जाएगा
अख्तर याद रखें यह दमनकारी युवा आएगा

अख्तर अंसारी

رات کو بیٹھ کر لب دریا
دیکھنا آسماں کے تاروں کا

لوح دل پر ابھار دیتا ہے
نقش گزری ہوئی بہاروں کا

اختر انصاری

रात को बैठा रहा, लिप दरिया
आकाश में तारे देखें

गोली दिल को उठाती है
छापें एक तरल पदार्थ, वैश्विक, विसरित तरीके से प्राप्त की जाती हैं

अख्तर अंसारी

dard bhari ghazal

dard bhari ghazal

میرے محبوب مرے دل کو جلایا نہ کرو
ساز چھیڑا نہ کرو گیت سنایا نہ کرو

جاؤ آباد کرو اپنی تمناؤں کو
مجھ کو محفل کا تماشائی بنایا نہ کرو

میری راہوں میں جو کانٹے ہیں تو کیوں پھول ملیں
میرے دامن کو الجھنے دو چھڑایا نہ کرو

تم نے اچھا ہی کیا ساتھ ہمارا نہ دیا
بجھ چکے ہیں جو دیے ان کو جلایا نہ کرو

میرے جیسا کوئی پاگل نہ کہیں مل جائے
تم کسی موڑ پہ تنہا کبھی جایا نہ کرو

یہ تو دنیا ہے سبھی قسم کے ہیں لوگ یہاں
ہر کسی کے لیے تم آنکھ بچھایا نہ کرو

زہر غم پی کے بھی کچھ لوگ جیا کرتے ہیں
ان کو چھیڑا نہ کرو ان کو ستایا نہ کرو

شوکت پردیسی

dard bhari ghazal

https://shayari-urdu-hindi.com/husband-romantic-shayari-love-for-wife-shayari/

[ghazal video mein]

Best evers sad old new ghazals urdu hindi

छू गया जब कभी ख्याल तेरा
दिल मेरा देर तक धड़कता रहा

कल तेरा ज़िक्र छिड़ गया घर में
और घर देर तक महकता रहा

रात हम मैक़दे में जा निकले
घर का घर शहर मैं भटकता रहा

उसके दिल में तो कोई मैल न था
मैं खुद जाने क्यूँ झिझकता रहा

मुट्ठियाँ मेरी सख्त होती गयी
जितना दमन कोई भटकता रहा

मीर को पढते पढते सोया था
रात भर नींद में सिसकता रहा

gam bhari gazalen

गझल

Read more